बकरी पालन व्यवसाय से मुनाफा ही मुनाफा

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दोस्तों नमस्कार!

ऐग्रीकल्चल, कल्चर और ऐजुकेशन के इस खूबसूरत सफर में, आज आपको हम बकरी पालन विषय पर जानकारी देंगे। बकरी पालन व्यवसाय को किसान का ।ज्ड भी कहा जाता है। किसान जब चाहे अपनी बकरियों को बेच कर नकद आय प्राप्त कर सकता है।

अगर आप या आपके कोई परिचित बकरीपालन को एक व्यवसाय के रूप में अपनाने की सोच रहे हैं तो यह लेख आपके बहुत काम का हैं। बकरीपालन की इस जानकारी से आप अपने बकरी फार्म की उत्पादकता एवं उससे मिलने वाले लाभ को कयी गुना बढा सकते हैं।

भारत में बकरीपालन की वर्तमान स्थिति

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में बकरियों की संख्या लगभग 14.9 करोड़ है। बकरी पालन व्यवसाय में हमारा देश विश्व में द्वितीय स्थान पर है। देश में बकरियों की कुल संख्या का लगभग 76 प्रतिशत सीमान्त तथा छोटे ग्रामीण किसान परिवारों द्वारा पाला जा रहा है।

समय के साथ- साथ बकारी पालन एक जबरदस्त व्यवसाय का रूप लेने लगा है। बात ग्रामीण क्षेत्रों की हो या फिर शहरीय क्षेत्र की, पढ़े-लिखे नौजवानां और किसानों द्वारा बकरी पालन व्यवसाय खूब पसंद किया जा रहा है।

बढ़ते बकरी पालन व्यवसाय और इससे बनने वाले उत्पादों की माँग को देखते हुये भारत के साथ ही पड़ोसी देशों में भी एकीकृत बकरी पालन के मॉडल को विकसित किया जा रहा है।

बकरी पालकों की आय बढ़ने के साथ ही बकरी से प्राप्त होने वाले खाद्य उत्पादों जैसे- दूध, मांस आदि की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में बकरी पालन से प्राप्त होने वाले उत्पादों के प्रसंस्करण से किसानों को और भी अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है।

पिछले कुछ वर्षों में बकरी के मांस का बाजार मूल्य बहुत तेजी से बढ़ा है, जो वर्तमान में लगभग 500 से 750 रुपये प्रति किलोग्राम तक है। इस कारण से भी बकरी पालन व्यवसाय एक लाभकारी व्यवसाय के रूप में तेजी ये उभरा रहा है।

भारत में बकरीयों की लगभग 34 पंजीकृत नस्लें हैं। जिसमें से अधिकांश भारतीय नस्लें कठिन जलवायु के लिए अनुकूल, रोग, अल्प पोषण व पानी की कमी जैसी विषम परिस्थितियों में पालन के लिए अनुकूल हैं।

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बकरी पालन व्यवसाय के लिए नस्ल का चुनाव

बकरी पालन के लिए नस्ल का चुनाव भौगोलिक परिस्थितियों, जनवायु, वातावरण एवं प्रबंधन के तरीकों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

बकरी की प्रकृति मूल रूप से घुमक्कड़ी पशु की है। लेकिन इसकी कुछ नस्लें फार्म पर रखकर (स्टॉल फीडिंग) पलने वाली होती हैं, जो आर्थिक रूप से अधिक उपयोगी होती हैं।

विभिन्न व्यावसायिक बकरी पालकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तर भारत के लिए बकरी की ‘‘बरबरी नस्ल’’ को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। किन्तु अन्य नस्लों की बकरियों को भी कुछ आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को अपना कर आसानी से पाला जा सकता है।

पोषक तत्वों व औषधीय गुणों से भरपूर है ‘‘बकरी का दूध’’

बकरी का दूध पोषक तत्वों से भरपूर एवं औषधीय गुणों वाला होता है। हमारे देश में दुर्भाग्यवश ज्यादातर लोगों को बकरी के दूध की विशेषताओं के बारे में जानकारी नहीं है।

यही कारण है कि यहाँ लोग बकरी के दूध का सेवन करने में परहेज करते हैं। हालांकि धीरे-धीरे लोग बकरी के दूध के गुणों के बारे में जागरूक हो रहें हैं और अब इसकी मांग काफी तेजी से बढ़ रही है।

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उद्देश्य के अनुसार बकरी पालन के लिए नस्ल चुनाव करें

बकरी पालन व्यवसाय के लिए बकरी की नस्लों का चुनाव आपकी अपनी आवश्यकता एवं उद्देश्यों के अनुसार करना चाहिए।

उदाहरण के लिए जैसे पूर्वी भारत के हिस्सों में ‘‘ब्लैक बंगाल’’ एवं दक्षिण भारत में ‘‘ओस्मानाबादी’’ नस्लों को अधिकांशतः मांस उत्पादन के लिए विकसित किया गया है। जिन्हें बकरी पालकों द्वारा इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर पाला जाता है।

इसी प्रकार से उत्तर-पश्चिमी एवं मध्य भारत में पाली जाने वाली अधिकांश नस्लों को मांस एवं दुग्ध उत्पादन के लिए पाला जाता है। इनकी प्रमुख नस्लें बरबरी, बीटल, जखराना, सिरोही आदि हैं।

अगर उत्तर भारत में मांस के साथ दुग्ध उत्पादन के लिए भी बकरी पालन कार्य करना हो तो बीटल, जखराना, सिरोही, जमुनापारी नस्ल की बकरियां को पालना उपयुक्त रहेगा।

वर्तमान में बकरीपालकों द्वारा मुख्यतः बाजार की चार मांगों को ध्यान में रखकर बकरी पालन कार्य किया जा रहा है-

मांस उत्पादन के लिए बकरी पालन

दुनियां भर में मांस के लिए बकरी पालन को एक व्यवसाय के रूप में किया जाता है। प्रति बकरी प्रतिवर्ष अधिकतम मांस उत्पादन, यह मांस उत्पादन के लिए किये जाने वाले बकरी पालन व्यवसाय का मूल मंत्र है।

यदि आप मांस प्राप्त करने के लिए बकरी पालन कर रहे हैं तो आपको निम्न बातों को ध्यान में रखकर बकरी की नस्लों का चुनाव करना चाहिए-

  1. दो ब्यांतों के बीच कम अंतराल वाली नस्लों का चुनाव करें
  2. मेमनों के लिए मां के पास पर्याप्त दूध हो
  3. मेननों व वयस्कों की मृत्यु दर कम हो
  4. भोजन को पचाने की उच्च क्षमता हो
  5. नस्ल की बकरियों के शरीर में अधिक मांस व हड्डीयों का अनुपात अच्छा हो

यदि आप उक्त गुणों के आधार पर नस्ल का चयन करते हैं तो निश्चित ही आपको अधिक लाभ प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त आपको नियमित मीट बाजार के लिए नर बकरों को बाजार मांग के अनुसार 10 से 14 माह के बीच बेच देना चाहिए।

यह इसलिए कि आमतौर पर 10 से 12 माह के बाद नर बकरों की भोजन खाने की मात्रा काफी हद तक तेजी से बढ़ने लगती है। परंतु भोजन की खफत के मुकाबले वजन बहुत कम बढ़ता है और इससे आपकी लागत बढ़ती है।

खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार इस अवधि के बाद भी बकरियों को पाले रखने से, मांस की गुणवत्ता और स्वाद में भी कमी आने लगती है।

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ईद आदि अवसरों के लिए खस्सी नरों को पालना

भारत सहित कई अन्य देशों में जहाँ मुस्लिम भाई ईद का त्योहार मनाते हैं, वहाँ के लिए बकरीपालन विशेष ढंग से किया जाता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल ईद पर लगभग 3 करोड़ बकरों का व्यवसाय होता है।

ईद के लिए नर मेमनों को जन्म के 1 से 2 माह की उम्र में ही खस्सी बनाकर पाला जाता है। उनके पालन के दौरान उन्हें अच्छा पोषक आहार दिया जाता है।

इस प्रकार से पाले जाने वाले नर बकरों का वजन सामान्य प्रकार से पाले जाने वाले बकरों के वजन से लगभग 70 से 90 प्रतिशत तक अधिक होता है।

भारत में आमतौर पर ईद के लिए बकरियों की बरबरी, जमुनापारी, सिरोही, बीटल, सुरती, संगमनेरी आदि नस्लों को मांग के अनुरूप पाला जाता है।

इन बकरों को लगभग 14 से 18 माह की उम्र में औसत मूल्य से लगभग 100 से 200 प्रतिशत तक अधिक बाजार भाव पर बेचा जाता है।

शुद्ध नस्ल के प्रजनक नर व मादा बकरी तैयार करना

बकरी पालन व्यवसाय के लिए शुद्ध नस्ल के उच्च गुणवत्ता वाले नर व मादा बकरों की भी मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। इस कार्य को करने वाले बकरी पालकों को इनका बाजार भाव गुणवत्ता के अनुसार सामान्य के मुकाबले 50 से 100 प्रतिशत अधिक तक मिलता है।

विशेषतः नस्ल के अनुसार जिन नर एवं मादा बकरियों की लंबाई, ऊंचाई, शरीर भार, बहु-प्रसवता, दुग्ध उत्पादन क्षमता तथा नस्ल शुद्धता अधिक रहती है, ऐसी नस्लों की मांग अधिक रहती है।

भारत के उत्तरी राज्यों में प्रजनन (बीज उत्पादन) के लिए प्रमुख नस्लें बरबरी, सिरोही, बीटल, जमुनापारी को प्रयोग में लाया जाता है।

वही भारत के पूर्वी व उत्तर-पूर्वी भाग में ब्लैक बंगाल, मध्य भारत में ओस्मानाबादी तथा दक्षिण भारत में मालाबारी नस्लों को प्रजनन के लिए प्रयोग किया जाता है।जानी जाती हैं।

वर्तमान में समय के अनुसार अन्य नस्लों की बकरियों की मांग भी बढ़ रही है। आप भी शुद्ध नस्ल के प्रजनक नर व मादा बकरी व बकरों को तैयार करने का कार्य कर अच्छा मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं।

दुग्ध उत्पादन के लिए बकरी पालन

वर्तमान में बकरी के दूध और बकरी के दूध से बने विभिन्न मूल्यवर्धित उत्पादों की माँग भी भारत और अन्य देशों में बहुत तेजी से बढ़ रही है।

बकरी पालक अब मांस के साथ ही बकरी के दूध और दूध से बने विभिन्न मूल्यवर्धक उत्पादों को बेचकर भी अपेक्षाकृत अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

सामान्यतः बीटल, जखराना, जमुनापारी, सुरती और बरबरी नस्ल की बकरियां अधिक दुग्ध उत्पादन के लिए जानी जाती हैं। हरे चारा व चराने की अच्छी व्यवस्था होने पर यह नस्लें दुग्ध उत्पादन बढ़ा देती है।

दुग्ध उत्पादन के उद्देश्य को और प्रबल रूप देने के लिए ऐसे प्रजनन के लिए नर का चुनाव करें, जिसकी मां अधिकतम दुग्ध का उत्पादन (3 लीटर प्रतिदिन) करती हो एवं जिसका दुग्धकाल 150 दिनों में लगभग 200 लीटर का हो।

ऊन, चमड़े व गोबर के लिए बकरी पालन

भारत के विभिन्न राज्यों में बकरी पालन व्यवसाय को मांस, प्रजनन, दुग्ध उत्पादन के साथ ही कुछ अन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है।

बकरी पालकों द्वारा ऊन, चमड़े एवं कृषि कार्य के लिए गोबर की खाद प्राप्त करने के लिए भी बकरी पालन व्यवयाय को किया जाता है। आप भी इन कार्यों को अपने बकरी पालन व्यवसाय में जोड़कर अच्छा मुनाफा प्राप्त कर सकते हैं।

व्यावसायिक बकरी पालन हेतु नस्ल का चुनाव किस आधार पर करें

भौगोलिक स्थिति, जलवायु और बकरी पालन के उद्देश्य के अनुरूप ही नस्ल का चुनाव करना उपयुक्त होता है। एक बकरी पालक व्यवसायी को नस्ल का चुनाव करते वक्त निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

  • ऐसे प्रजनक नर का चुनना करें जिसका शरीर भार नस्ल के अनुरूप औसत से 25 से 30 प्रतिशत अधिक हो।
  • मध्यम आकार की नस्ल में 20 से 35 किलोग्राम भार वाले नरों का चुनाव करें।
  • छोटे आकार की नस्ल में 15 से 20 किलोग्राम भार वाले नरों का चुनाव करें।
  • ऐसी नस्ल का चुनाव करें जिसमें दुग्ध उत्पादन की क्षमता सामान्य नस्लों के मुकाबले 20 से 30 प्रतिशत अधिक हो।
  • व्यावसायिक बकरी पालकों को फाउण्डेशन स्टॉक (बीज) शुद्ध नस्ल एवं उच्च उत्पादकता के पशुओं से आरंभ करना चाहिए।
  • ध्यान रखें कि फाउण्डेशन स्टॉक में शामिल बकरियां अलग-अलग समूह की हों, अन्यथा प्रजनन के बाद उत्पादकता कम हो जाएगी।
  • प्रारंभ में ही आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के लिए नर व मादा का अनुपात 1ः10 रखें।
  • कुछ समय बाद 1.5 से 2 वर्ष में नर व मादा का अनुपात 1ः20 कर दें।
  • अगर आप नस्ल के मूल क्षेत्र से दूर बकरी पालन फार्म शुरू करने जा रहे हैं, तो कम उम्र (6 माह से 2 वर्ष) के नर व मादा पशुओं का चयन करें। इस उम्र के पशु शीघ्रता से नये वातावरण के अनुरूप स्वयं को ढालने में सक्षम होते हैं।

बकरियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवहन करते वक्त निम्न बातों का ध्यान रखें

  1. बकरियों को परिवहन करते समय उनके डर और तनाव को कम से कम रखना अनिवार्य होता है, इसके लिए यात्रा के दौरान प्रत्येक 200 से 250 कि.मी. पर (प्रत्येक 4-5 घण्टे बाद) लगभग 2 घण्टे का आराम दें।
  2. इस दौरान गाड़ी से उतारकर आस-पास सड़क किनारे घुमाना चाहिए।
  3. गाभिन बकरियों को लंबी यात्रा से दूर रखें।
  4. बकरियों को परिवहन करने से 18 से 25 दिनों पूर्व पी.पी.आर. का टीका लगवायें, क्योंकि तनाव होने का एक कारण यह रोग भी होता है।
  5. बकरियों को चोट आदि से बचाने के लिए नर व बड़े पशुओं को छोटे एवं कमजोर पशुओं से अलग करके उन्हें उचित तरीके से गाड़ी में लोड करें।

बकरी पालन व्यवसाय को कितनी बकरियों से शुरू करें

  • शुरूवात में उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले 30 से 50 पशुओं से आप अपना बकरी पालन व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। इससे प्रथम वर्ष में उत्पादन और प्रबंधन के सभी पहलुओं को न्यूनतम जोखिम के साथ समझे में आपको मदद मिलती है।
  • शुरुआत में 10 बकरियों को 01 बकरे के साथ रखना चाहिए, ताकि झुंड में पर्याप्त आनुवंशिक विविधता लायी जा सके।
  • आपातकालीन की स्थिति के लिए हमेशा एक युवा बकरे को विकल्प के रूप में रखना चाहिए।
  • बकरी पालकों को सलाह दी जाती है कि वह दूसरे वर्ष से बाजार की मांग के अनुसार झुंड की संख्या को बढ़ायें।
  • जिन बकरियों में बढ़वार दर, प्रसवता दर व उत्पादन सामान्य से कम है, उन्हें शुरूवात में ही बाजार में बेच दें।

बकरी पालन व्यवसाय के लिए जगह का चुनाव

व्यावसायिक बकरी पालन के लिए जगह का चुनाव करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाता चाहिए-

  • बकरी पालन फार्म स्थापना हेतु ऊंचाई वाली समतल जमीन का चुनाव करें।
  • बरसात के मौसम में जलभराव वाली जगह को चुनने से बचें।
  • बाड़े में बकरियों के लिए पीने का पानी होना चाहिए।
  • बाड़ों में सफाई एवं मल-मूत्र का उचित प्रबंधन होना चाहिए।
  • बाडे के आस-पास ही हरा चारा उगाने के लिए भूमि की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • बकरी पालन कार्य हेतु फार्म के सम्भावित आकार को ध्यान में रखकर बकरियों के लिए अलग-अलग बाडे़ का निमार्ण उनकी आयु, लिंग व शारीरिक दशा के अनुसार करना उचित रहता है।
  • फार्म के खुला क्षेत्रा में भौगोलिक स्थिति के अनुसार चारा देने वाले वृक्ष जैसे सहतूत, भीमल, दुदिल आदि का वृक्षारोपण करना चाहिए।
  • भारत के उत्तरी भाग में अर्द्ध खुले व पूर्ण ढंके दोनों तरह के शेड बनाने का प्रावधान है।
  • पूरे बाड़े का 66 प्रतिशत खुली जगह के रूप में तथा शेष 34 प्रतिशत भाग बंद आवास के रूप में रखना चाहिए।

बकरी पालन कार्य में स्वास्थ्य प्रबंधन

बकरी पालन व्यवसाय को सफलता पूर्वक व मृत्यु दर के जोखिम को कम करने के लिए निम्न बातों को ध्यान में रखना अनिवार्य है-

  • बकरियों में आंतरिक परजीवीयों के नियंत्रण के लिए समय-समय पर पशु चिकित्सक की सलाह पर पेट के किडों की दवायें देनी चाहिए।
  • बकरियों को बाहरी परजीवीयों से भी बचाना चाहिए।
  • विभिन्न प्रकार के रोगों से बचाव के लिए समय पर पी.पी.आर, खुर पका-मुंह पका (एफ.एम.डी.), इंट्रोटोक्सीमिया (ई.टी.) का टीकाकरण निर्धारित सिड्यूल के अनुसार करवाते रहना चाहिए।

यदि बकरी पालन करने वाले अथवा इस व्यवसाय की शुरूवात करने के इच्छुक उद्यमी उक्त जानकारियों एवं प्रबंधन तकनीकों को गंभीरतापूर्वक अपनाते हैं, तो निश्चित ही बकरी पालन व्यवसाय से भरपूर मुनाफा कमा सकते हैं।

तो दोस्तों आपको “व्यावसायिक बकरी पालन”  के बारे में दी गयी यह जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताईये।

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