सेब की उन्नत बागवानी-अधिक लाभ | Improved Apple Horticulture-High Profit

किसान भाईयों नमस्कार!

भारत के पहाड़ी प्रदेशों में बागवानी किसानों का प्रमुख कार्य रहा है। सेब की बागवानी किसानों के लिए रोमांचक होने के साथ ही मोटी आय प्राप्त करने का भी मुख्य स्रोत है।

एक बागवान को धैर्यवान, मेहनती, खोजी और नये-नये प्रयोग करने वाला होना चाहिए। यह इस लिए क्योंकि बगीचे में पेड़ लगाते ही रातों-रात सेब नहीं लग जाते, इसके लिए बगीचे में लगाये गये पेड़ों को अपने बच्चों की तरह पालना पड़ता है। तीन से पाँच साल तक अच्छी देख-रेख करनी होती है।

अपने बगीचे के लिए अच्छी प्रजाति का चुनाव (जो आपकी भौगोलिक क्षेत्र के अनुरूप हो), उन्नत तकनीकी जानकारी, पौध रोपड़ का समय, देख-रेख, खाद-उर्वरक, रोग प्रबंधन जैसे अनेकों महत्पूर्ण कार्य हैं जो एक बागवान होने के नाते आपको समय पर करने होते हैं।

इस आलेख में हम आपको सेब की उन्नत बागवानी के विषय में जानकारी प्रदान करेंगे। हमें लगता है कि यह जानकारी आपके बागवानी कार्य में थोड़ा सा मूल्य जरूर जोड़ने में सफल होगी।

सेब का परिचय

ठंडी जलवायु के फलों में सेब अपने खास स्वाद, सुगंध, रंग व अच्छी भण्डारण क्षमता के लिए जाना जाता है। सेब का उपयोग ताजे और प्रसंस्करित उत्पादों जैसे-जैम, जैंली, चटनी, जूस, मुरब्बा, सिरका, चंग्स इत्यादि के रूप में किया जाता है।

सामान्य रूप से सेब की बागवानी समुद्र तल 1500 से 2700 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सपफलता पूर्वक की जाती है। सेब की बागवानी के लिए 0.5 से 28 डिग्री सेल्सियस तापमान एवं वर्ष में 1000 से 1500 मि.मी. बारिस अभीष्ट मौसम है। सेब की अच्छी फसल के लिए 150 से 1500 घंटे का चिलिंग टाईम 00 से 70 सेल्सियस के तापमान में वर्ष भर में होना चाहिए।

अधिकतम पैदावार के लिए सेब के बागवानी क्षेत्र में अच्छी जल निकास वाली गहरी मटियार दोमट मिट्टी जिसका पी-एच मान 5.5 से 6.5 हो, उपयुक्त मानी जाती है। क्षारीय, कंकरीली या पथरीली भूमि इसकी खेती के लिए उपयोगी नहीं होती है। बहुत अधिक अम्लीय भूमि में सेब में मूलसंधि विगलन रोग लगने का जोखिम बना रहता है।

सेब की उन्नत किस्में

भारत में उगाई जानी वाली लगभग किस्में विदेशों से आयातित हैं। परिपक्वता के अनुसार व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली किस्मों का विवरण निम्न प्रकार है-

सेब की शीघ्र पकने वाली किस्में

अर्ली सनबरी, फैनी, बिनोनी, ग्रीन स्वीट, चौबटिया प्रिन्सेस, चौबटिया अनुपम, रेड स्ट्रैकेन और समरक्वीन सेब की शीघ्र पकने वाली किस्में हैं।

सेब की मध्यम समय में पकने वाली किस्में

किंग ऑफ पीपिन, मैकेइन्टोश, स्पार्टन, रेड डेलीशियस, रॉयल डेलीशियस, बांस डेलीशियस और रिच-ए-रेड सेब की मध्यम समय में पकने वाली किस्में हैं।

सेब की देर से पकने वाली किस्में

राइमर, बर्किघम, पैक्स प्लीजेन्ट, ग्रेनी स्मिथ और गोल्डन डेलीशियस सेब की देर से पकने वाली किस्में हैं।

घाटी क्षेत्र के लिए सेब की उन्नत प्रजातियां

अन्ना, ट्रॉपिकल ब्यूटी, वेरेड, नावमी, माइचल और इनसिंमर घाटी क्षेत्र में उगाने के लिए सेब की उन्नत प्रजातियां हैं।

सेब की स्पर प्रजातियां

अगर आप सेब की सघन बागवानी करना चाहते हैं तो स्पर किस्मों का चुनाव आपके लिए अच्छा निर्णय होगा। स्पर प्रजातियां आकार में बौनी होती हैं और खूब फलती हैं। इन किस्मां की लंम्बी टहनियों पर असंख्य स्पर पाए जाते हैं, इनमें पुष्पन व फलन अच्छा होता है।

स्पर प्रजातियों में रेड चीफ, रेड स्पर, वैल स्पर, सिल्वर स्पर, गोल्डन स्पर, आरगन स्पर, गेलगाला, समर रेड मुख्य हैं।

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सेब में पादप प्रवर्द्धन (पौध निर्माण)

भारत में सेब का प्रवर्द्धन सामान्यतः बीजू मूलवृन्त (सीडलिग) के ऊपर कलम बांधकर या चश्मा चढ़ाकर किया जाता है। कलिकायन का कार्य मई-जून में एवं रोपण कार्य सुशुप्तावस्था (दिसंबर-फरवरी) में किया जाता है। ग्राफटिंग के बाद मूलवृन्त से निकलने वाली शाखाओं को काट दिया जाता है, ताकि ग्राफटिंग वाली शाखा में अच्छी वृद्धि हो।

सेब के अच्छे मूलवृन्त (रूट स्टॉक) की किस्में

अधिक ऊचाई वाली रूट स्टॉक प्रजातियां- एम-16, एम-12 एवं एम-25
सामान्य ऊचाई वाली रूट स्टॉक प्रजातियां- एमएम-104, एम एम-111 एवं एम एम-109
मध्यम बौनी रूट स्टॉक प्रजातियां- एम एम-106, एम-7 एवं एम-26
बौनी रूट स्टॉक प्रजातियां- एम-8 एवं एम-9
अत्यधिक बौनी रूट स्टॉक प्रजातियां- एम-27

सेब का पौध रोपण

सेब का पौध रोपण सामान्य रूप से 6×6 मीटर दूरी पर किया जाता है। पौध रोपण के लिए 1×1×1 मीटर आकार के गड्ढे बनाकर किया जाता है। पौध रोपड़ के समय प्रत्येक गड्ढे में उपजाऊ मिट्टी के साथ 30 से 40 कि.ग्रा. अच्छे से सड़ी हुई गोबर की खाद, 500 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट व 50 ग्राम क्लोरोपायरीफॉस की धूल को मिलाकर गड्ढे को 15 से 20 सें.मी. की ऊंचाई तक भर दें।

गड्ढे की खुदाई के लिए रेखांकन (ले-आउट) व गड्ढे खुदाई का कार्य अक्टूबर-दिसंबर में कर देनी चाहिए। रोपण दिसंबर-फरवरी तक करना उचित रहता है। रोपण के समय 30-33 प्रतिशत परागण किस्मों का समावेश करना उत्पादन की दृष्टि से उपयुक्त होता है।

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खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

सेब के पौधों को प्रतिवर्ष प्रति पौध 05 कि.ग्रा. सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 25 ग्राम नाइट्रोजन, 20 ग्राम फॉस्फेट, 25 ग्राम पोटाश देना चाहिए। खाद और उर्वरक देने का क्रम 20 वर्षों तक लगातार पौधे की आयु के अनुसार मात्रा को बढ़ाते हुए नियमित करना चाहिए।

सेब की पौध को जैविक खाद देने के लिए वर्षा ऋतु के समाप्त होने के बाद, सितंबर-अक्टूबर में पौधे के तने के चारों ओर थाला बनाकर तने से 20 से 25 सें.मी. की दूरी पर चारों ओर फैलाकर करें। इसके बाद लगभग 20 से 25 सें.मी. गहरी गुड़़ाई कर खाद को मिट्टी में अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए।

नाइट्रोजन की 3/4 मात्रा और फॉस्फोरस तथा पोटाश की पूरी मात्रा पौधों में कली खिलने से 2 से 3 सप्ताह पूर्व अर्थात फरवरी के दूसरे पखवाड़े तथा नाइट्रोजन की शेष 1/4 मात्रा फल तोड़ने के बाद तने से पर्याप्त दूरी रखकर प्रयोग करना लाभदायक होता है।

सेब में परागण एवं फलन

सेब की बहुत सी प्रजातियों में स्व-परागण होता है। लेकिन दूसरी ओर कुछ प्रजातियों में फल तब तक नहीं आते, जब तक पेड़ों के बीच में किसी परागणकर्ता (पॉलिनेटर) प्रजाति का रोपण न किया जाए। अपने बागीचे से अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए 30 से 33 प्रतिशत तक परागण किस्मों के पौधों का रोपड़ करना चाहिए।

सेब की अर्ली किस्मों जैसे-टाइडमैंस, अर्ली वारसेस्टर, डेलीशियस किस्मों में रेड गोल्ड व पछेती प्रजातियों राइमर व बर्किघम को साथ में रोपा जाना चाहिए।

सेब की स्पर प्रजातियां में गोल्डन स्पर, स्कारलेट गाला, रेड फ्रयूजी व क्रेब एप्पल को परागणकर्ता प्रजातियों के रूप में रोपित किया जाना चाहिए।

एक हैक्टर क्षेत्रफल में सेब के प्रभावी परागण के लिए 2 से 3 स्वस्थ व पूर्ण विकसित मधुमक्खीयों की कॉलोनियों को रखने से सेब की फसल में गुणवत्तापूर्ण परागण सुनिश्चित किया जा सकता है।

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सेब में सिंचाई

भारत में सेब की अधिकतर बागवानी वर्षा पर ही निर्भर रहती है। सामान्यतः 1000 मि.मी. या इससे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

ऐसे क्षेत्र जहाँ 1000 मि.मी. से कम वर्षा होती है सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। प्रारम्भिक अवस्था में सिंचाई करना आवश्यक होता है। बौने रूट स्टॉक वाली सेब की सघन बागवानी में पौधों की सिंचाई प्रारम्भिक अवस्था से ही की जानी चाहिए।

पर्वतीय क्षेत्रों में सेब की फसल में सिंचाई की सुविधा न होने पर नमी संरक्षण के लिए पलवार का प्रयोग लाभ दायक होता है। पलवार के लिए 400 गेज की काली पॉलीथीन का प्रयोग करना आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त होता है।

सेब में वृद्धि नियामकों (ग्रोथ रैंगुलेटर) का प्रयोग

अगर आप सेब में बढ़वार को तेज करना चाहते हैं तो आपको ग्रोथ रैंगुलेटर का प्रयोग करना होगा। सेब में पैक्लोब्यूट्राजाल (0.4 से 2.0 ग्राम प्रति वर्गमीटर) का प्रयोग लगभग फरवरी माह में तने के चारों ओर मिट्टी के साथ मिलाकर करना चाहिए। ग्रोथ रैंगुलेटर पुष्प कलिका विभेदन में सहायक होता है।

ध्यान रखे फसल के अगले वर्ष में इसकी आधी मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए। सेब में फूलाई के समय अल्फा-2 नेफ्रथाक्सी प्रोपाइनिक एसिड 100 पी.पी.एम. घोल का छिड़काव करने से सेब में फलों की संख्या, आकार एवं गुणवत्ता में वृद्धि प्राप्त की जाती है।

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सेब में कटाई-छंटाई

सेब के पौधों को अच्छा आकार देने के लिए रोपाई के 4 से 5 वर्षों तक ट्रेन्ड करने की आवश्यकता होती है। ऐसा करने पर पौधे फलों के वजन को सम्भाल लेते हैं और पौधों को सूर्य की रोशनी भी अच्छे से मिल पाती है।

सेब में ट्रेनिंग के लिए मॉडीफाइड सेन्टर लीडर विधि सबसे अच्छी मानी जाती है। ट्रेनिंग की इस विधि में जमीन से 50 से 70 सें.मी. की ऊंचाई तक तने से शाखाएं नहीं निकालनी चाहिए।

बाद में 30 से 40 सें.मी. की दूरी से अलग-अलग दिशा में मुख्य शाखा से 6 से 7 उप शाखाएं लेने के बाद मुख्य शाखा को ऊपर से काट देना चाहिए।

सेब की फल तुड़ाई व ग्रेडिंग

बाजार में अच्छा मुल्य पाने व गुणवत्तापूर्ण फल उत्पादन प्राप्त करने के लिए उचित समय पर सेब की तुड़ाई करना आवश्यक है। फल तुड़ाई का समय किस्म, समुद तल की ऊंचाई और जलवायु पर निर्भर करता है।

सेब उत्पादक बागवान फलों के तैयार होने का अंदाजा फलों के रंग, फलों के स्वाद, फलों के दाब परीक्षण के साथ ही कुल घुलनशील ठोस पदार्थों आदि की जाँच के आधार पर लगाते हैं।

सेब के फल जून से नवम्बर तक किस्म व स्थान विशेष के अनुसार तैयार होते हैं। तुड़ाई कार्य को 3 से 4 दिनों के अंतराल में सूखे दिनों में फलों के डंठल सहित करना चाहिए। फल तुड़ाई के दौरान फलों को आराम से टोकरियों या कैंरेटों रखना चाहिए, ताकि फलों में चोट न लगे।

फल तोड़ने के बाद फलों की छटाई (सॉर्टिंग), श्रेणीकरण (ग्रेडिंग) का करना चाहिए। इस कार्य को करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि, फलों को किसी प्रकार की चोट न लगे। फलों की ग्रेडिग के लिए ग्रेडर मशीन का प्रयोग करना अच्छा रहता है।

अगर सेब उत्पादन की बात करें तो क्षेत्रीय जलवायु, भौगोलिक स्थिति, सेब की प्रजाति के अनुसार उत्पादन में अंतर देखने को मिलता है। सामान्य रूप से सेब में प्रति पेड़ औसत 40 से 100 कि.ग्रा. तक प्रतिवर्ष उत्पादन प्राप्त होता है।

तो दोस्तों आपको “सेब की उन्नत बागवानी-अधिक लाभ ” के बारे में दी गयी यह जानकारी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताईये।

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